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The questionSawaal
اصل سوالGair muslim ko qurbani ka gosht dena kaisa hai ? Qurbani ke masail
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The responseAl-Jawab
गैर मुस्लिमों को कुर्बानी का गोश्त देना कैसा है | Qurbani ke masail
क्या फरमाते हैं ओलामाये किराम और फ्किमुफ्सतियाने किराम इस मसले में की एक शख्श इस बात का क़ायल है की कुर्बानी का गोश्त गैर मुस्लिमों को देना जायज है . और दलील के तौर पर माइल खैराबादी की किताब इस्लामी शरीयत पेज 91 का हवाला पेश करता है, जिस में लिखा है ” कुर्बानी का गोश्त अगर मुस्लिमों को भी दिया जा सकता है , अगर गैर मुस्लिम पड़ोसी हो तो देना ही चाहिए . जबकि बक्र कुर्बानी का गोश्त गैर मुस्लिमों को ना दिए जाने का क़ायल है .लिहाज़ा कुरान और हदीस की रोशनी में वाज़ेह बयान फरमाइए क्या गैर मुस्लिमों को कुर्बानी का गोश्त दे सकते हैं या नहीं दे सकते हैं.जवाब:
कुर्बानी इस्लाम के श’आइर में से है इसलिए जो लोग इस्लाम को नहीं मानते उनसे ना तो कुर्बानी का मुतालबा हो सकता है ना ही कुर्बानी का गोश्त उन्हें दिया जा सकता है . ताकि यह ना हो कि इस्लाम ने अपने श’आइर की कोई चीज उन पर थोप दी . खासतौर पर इस सूरत में जब कुर्बानी किसी बड़े जानवर की हो कि ऐसा गोश्त उन्हें देना एक तरह से उनके साथ मजाक होगा , बल्कि उसे मालूम हो जाए तो ये उसके दिल में नफरत और दुश्मनी क्या जरिया भी हो सकता है. फिर एक मुसलमान को यहां इस हैसियत से भी गौर कर लेना चाहिए कि यहां के गैर मुस्लिमों के मजहब में गोश्त खाने की इजाजत है भी या नहीं . अगर उनके मजहब में उसकी इजाजत ना हो कि उनके नजदीक यह जीव हत्या है तो उन्हें ऐसे भी गोशत देने से रोका जाए. हदीस में है की रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया : पड़ोसी गैर मुस्लिम का सिर्फ एक हक e जीवार है यानी उसका पड़ोस का हक है . सहाबा ने अर्ज़ की या रसूल अल्लाह उनको अपनी कुर्बानियों में से गोशत दे सकते हैं? तो आपने फरमाया : मुशरिकों को कुर्बानियों में से कुछ ना दो. बहारे शरीयत 16 पेज 182 जैद नबी ए करीम सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम की बात को बगैर चूं और ची रा के माने . सरकार सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम ने कुछ हिकमतों की बुनियाद पर यह हुक्म दिया है . ऊपर की वजाहत की रोशनी में ज़ैद का कहना गलत है कि गैर मुस्लिम को कुर्बानी का गोश्त दिया जा सकता है और बकर जो यह कहता है कि गैर मुस्लिमों को कुर्बानी का गोश्त नहीं देना चाहिए उसकी बात सही है.कुर्बानी की फालतू हड्डियों को क्या किया जाए | Qurbani ke masail
क्या फरमाते हैं उलमा e दीन इस मसाले में की इज्तिमाई कुर्बानी के जरिए जो फालतू हड्डियां मिलती हैं उनको फरोखत कर सकते हैं या नहीं . उनको बेचने से जो रकम मिलती है उसको देनी कामों के मसरफ के लिए दे दिया जाना दुरुस्त है या नहीं ? कुछ लोगों का कहना है कि इज्तिमाई कुर्बानी की फालतू हड्डियां माले तिजारत नहीं है , लिहाज़ा उनको बेचना जायज नहीं है . कुर्बानी के खाल के फरोख्त से जो रकम मिल रही है सिरे से हिंदुस्तान की दीनी दर्स्गाहें अपने मसारीफ में लगाते हैं . ऐसे सूरते हाल में सिर्फ हड्डियों को माले तिजारत में शुमार करना या तफ्तीश करके उनकी फरोख्त करना जायज ठहराना दुरुस्त है या नहीं.जवाब :
जी हुक्बाम क़ुर्नीबानी की खाल का है वहीं हुक्म उसकी हड्डी का भी है . मदरसा में सर्कफ़ और खरच करने के लिए उसे बेचना जायज और सवाब है . तमाम फालतू हड्डियों को जमा करके बेचें और सुन्नी मदारिस में उसका दाम सरफ करें . यह कुर्बत और सवाब का काम है . बेशक अल्लाह बेहतर जानता है.गैर रिहायशी मदरसों में कुर्बानी का चमड़ा देना कैसा | Non hostel madaris me chamda dena kaisa hai ?
सवाल यह है कि ज़ैद एक ऐसा मदरसा चला रहा है जिसमें मकामी तालिबात तालीम हासिल करके घर चली जाती हैं . फिलहाल उसमें रहने का कोई इंतजाम नहीं है . ज़ैद का इरादा है कि मदरसा में तालिबात के रहने का इंतजाम करें तो आया ऐसी सूरत में फिलहाल मदरसा के लिए ज़ैद को कुर्बानी का चमड़ा देना दुरुस्त है या नहीं?जवाब :
उस मदरसे को कुर्बानी का चमड़ा देकर के मदरसे की मदद करना जाइज और सवाब का जरिया है . कि उस मदरसे की मदद भी कुर्बत और कारे सवाब है. और कुर्बानी का चमड़ा या जो उसका दाम है हर कारे सवाब में सरफ करना जायज है . हदीस शरीफ में है कुर्बानी के गोश्त के ताल्लुक से की खाओ और महफूज रखो और सवाब का काम करो. सुनन अबू दाऊद शरीफ जो हुकुम गोशत का है ठीक वही हुक्म चमड़े का भी है . लिहाजा उसे भी सवाब के काम में सरफ करना जायज है जैसे गोश्त को सवाब के काम में सरफ करना जायज है . अलबत्ता उसको पैसे के बदले में ना बेचे ताकि वह अपने आप पर और अपने घर वालों पर खर्च कर सके , बल्कि अगर उसको बेचता है तो वह उसको सदका करने की नियत से बेचे और उसके दाम को या फिर उसके चमड़े को वह सदका की नियत से बेच कर जो उसकी रकम होती है वह किसी गरीब को या किसी मदरसा को दे दे. Mohaqqiq e Masail e Jadeeda Hazrat Mufti Nizamuddin Razavi . Principel Jamia Ashrafia Mubarakpur.
D
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Darul Ifta Scholar
Scholar & reviewer
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